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आज 61 साल के हो रहे संजय दत्त की पहली फिल्म ‘रॉकी’ देखना कैसा अनुभव है?

29 जून 2018 यानी संजय दत्त के 59वें जन्मदिन से ठीक एक महीने पहले उनकी बायोपिक ‘संजू’ रिलीज हुई थी. फिल्म बॉक्स ऑफिस पर खासी सफल भी रही. इसके बाद हार्पर कालिन्स पब्लिकेशन उनकी आत्मकथा लॉन्च करने का एलान किया. इन तथ्यों से संजय दत्त के अभिनय का कद भले ही पता न चलता हो, लेकिन बतौर स्टार तो उनके कद अंदाजा लगाया ही जा सकता है.

लगभग चार दशक पहले साल 1981 में संजय दत्त की पहली फिल्म ‘रॉकी’ रिलीज हुई थी. इस रोमांटिक-एक्शन फिल्म का निर्देशन उनके पिता सुनील दत्त ने किया था. 80 के दौर के मिजाज वाली ये औसत मसाला फिल्म सुपरहिट रही. इसकी एक बड़ी वजह यह मानी जाती है कि ‘रॉकी’ की रिलीज से पांच दिन पहले ही मशहूर अदाकारा और संजय दत्त की मां नरगिस का निधन हो गया था. तब से अब तक संजय दत्त बॉलीवुड के फेवरेट ‘संजू बाबा’ बन चुके हैं.

‘रॉकी’ में बाइक पर सवार होकर ‘रॉकी मेरा नाम…’ गाते हुए संजय दत्त पहली बार सिल्वर स्क्रीन पर आते हैं. अधखुली आंखों वाले इस लड़के को देखकर अब कोई भी यह कह सकता है कि नशे का असर किस कदर उसके चेहरे पर हावी है. लेकिन तब शायद लोगों को इसके बारे में ज्यादा अंदाजा नही था इसलिए उन्हें यह संजय दत्त की कोई खासियत ही लगी होगी. बाद में भी बाबा के जानने वालों और मीडिया ने इस बात का पता तो दे सकती थीं लेकिन, ठीक समय कभी नहीं पता चल पाता अगर सालों बाद संजय दत्त की बायोपिक उनकी जिंदगी के इस पड़ाव पर उनके नशे की गिरफ्त में होने की बात नहीं करती.

ये अधखुली आंखें पूरी फिल्म में आपका ध्यान खींचती रहती हैं. हालांकि इन्हें नजरअंदाज कर दिया जाए तो आपको मासूम चेहरे वाले एक सुंदर-सजीले नौजवान की झलक भी मिलती है. रॉकी देखते हुए कई बार बालों को झटकने के स्टाइल और चेहरे की बनावट के चलते संजय दत्त की जगह सुनील दत्त को देखने का भ्रम भी होता है.

अभिनय का ककहरा पढ़े-पढ़ाए बगैर कैमरे के आगे धकेल दिया गया यह स्टार पुत्र शायद आकर चला ही जाता अगर रॉकी हिट न हुई होती. और रॉकी हिट क्यों हुई, इसका जिक्र हम पहले कर चुके हैं. अपनी पहली फिल्म में, अपने ही पिता के निर्देशन में काम करने वाले संजय दत्त एक तरफ तो कच्चे एक्सप्रेशंस और नकली संवाद अदायगी से न के बराबर ही प्रभावित कर पाते हैं. दूसरी तरफ उनके चेहरे पर नजर आने वाला बचपना और सींकिया शरीर उनके हीरो होने के सच पर यकीन नहीं दिलवा पाता. इसके अलावा जो रही-सही कसर होती है, वह उनके लगभग लड़खड़ाते डांस स्टेप्स और अनगढ़ एक्शन से पूरी हो जाती है.

कुल मिलाकर कहने का मतलब यह कि पहली फिल्म से संजय दत्त इस बात का यकीन बिल्कुल नहीं दिला पाते कि उनका करियर इस फिल्म के आगे भी जा पाएगा. वैसे अभिनय, डांस और एक्शन की बात करें तो ऐसा नहीं है कि भविष्य में उन्होंने कोई कमाल कर दिखाया. हां, बाद में उनमें एक अलग तरह का कॉन्फिडेंस जरूर आ गया जो उन्हें हीरो वाली इमेज के लिए एकदम फिट बनाता था. यही आत्मविश्वास उनकी मुन्नाभाई सीरीज की फिल्मों के अतिलोकप्रिय होने की वजह भी बना.

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