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राजस्थान: अनिश्चय दूर होना चाहिए

Edited By Shivendra Suman | नवभारत टाइम्स | Updated:

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राजस्थान में चल रहा राजनीतिक संकट कुछ ज्यादा ही लंबा खिंचता जा रहा है। जब से सचिन पायलट की अगुआई में कांग्रेस के एक धड़े ने अपने असंतोष को सार्वजनिक करते हुए राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की मांग की है, तभी से प्रदेश की गहलोत सरकार की वैधता पर संदेह जताया जा रहा है। जैसा कि ऐसे मामलों में आम तौर पर होता है, सरकार के बहुमत को लेकर दोनों धड़े परस्पर विरोधी दावे कर रहे हैं।

पायलट और उनके समर्थक विधायकों ने पार्टी छोड़ने की बात अब तक नहीं कही है, इसलिए इसे कांग्रेस का अंदरूनी झगड़ा ही माना जाएगा। इस झगड़े की वजहें चाहे जो भी रही हों और इसके लिए जिसे भी जिम्मेदार ठहराया जाए, इसका परिणाम यह हो रहा है कि प्रदेश की निर्वाचित सरकार अनिश्चय और असमंजस की स्थिति में फंसी हुई है। वह भी ऐसे समय, जब न केवल देश के तमाम राज्यों में बल्कि औरों के पहले से राजस्थान में कोरोना ने जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर रखा है।

सरकारें, प्रशासनिक और स्वास्थ्य तंत्र अपनी पूरी ताकत लगाकर भी हालात को काबू में नहीं ला पा रहे हैं। इतना ही नहीं, भारत के एक बड़े हिस्से में पेड़-पौधों के काल बने टिड्डी दल भी राजस्थान के ही रास्ते देश में आ रहे हैं। याद रहे, टिड्डियों के प्रकोप की दृष्टि से जुलाई और अगस्त के महीने सबसे खतरनाक माने जाते हैं। आज जब कोरोना और टिड्डी दलों की दोहरी चुनौती के सामने राजस्थान में सर्वाधिक चौकस सरकार की जरूरत है, तब यह प्रदेश राजनीतिक अनिश्चय का शिकार बना हुआ है।

जाहिर है, देश और प्रदेश दोनों का हित इसी में है कि दोनों पक्षों के दावों को एक तरफ रखकर जल्द से जल्द बहुमत परीक्षण करवाया जाए, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। लेकिन कभी अदालती पेचीदगी से तो कभी गवर्नर हाउस की मेहरबानी से यह मामला लंबा ही खिंचता जा रहा है। अभी जब स्पीकर ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपनी याचिका कोर्ट की इजाजत से वापस ले ली है तो अनिश्चय दूर करने में देरी का कोई औचित्य नहीं है। अच्छी बात यह है कि देश में इस बात पर सर्वसम्मति बन चुकी है कि किसी भी सरकार के बहुमत का फैसला दावों और जवाबी दावों, या फिर विधायकों की परेड के आधार पर नहीं बल्कि विधानसभा के पटल पर ही हो सकता है।

देश के लोकतांत्रिक इतिहास में संभवतः यह पहला मौका है जब एक मुख्यमंत्री विधानसभा में अपना बहुमत साबित करने को बेकरार नजर आ रहा है, पर राज्यपाल की ओर से एक के बाद एक तकनीकी अड़चनें खड़ी करके बहुमत परीक्षण टालने का प्रयास किया जा रहा है। किसी गुट या दल के राजनीतिक हितों का तकाजा चाहे जो भी हो, राज्यपाल की ऐसी भूमिका उचित नहीं है। अगर वे इस बात को लेकर गंभीर नहीं हैं तो गृह मंत्रालय और केंद्र सरकार को उन्हें इसका एहसास कराना चाहिए।

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