Home Reviews आधी आबादी की नौकरियां खा रहा कोरोना

आधी आबादी की नौकरियां खा रहा कोरोना

लेखक: क्षमा शर्मा।।
कोरोना की शुरुआत से ही लोगों के रोजगार पर बन आई है। बेरोजगार होने वालों में महिलाओं की संख्या बहुत ज्यादा है। विमन पॉलिसी रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि इस दौरान दुनिया भर में साठ प्रतिशत औरतों ने अपना रोजगार खो दिया। वहीं एक अन्य सर्वे में बताया गया था कि भारत में पुरुषों से पहले औरतों की नौकरियां जा रही हैं। 2005 से 2018 तक भारत में औरतों की रोजगार में भागीदारी 32 फीसद थी, जो अब महज 21 फीसद रह गई है। औरतों के लिए नौकरियां पहले ही कम थीं, यह महामारी उन्हें और ले डूबी।

अपने देश में जैसे-जैसे मध्यवर्ग की औरतें पढ़-लिखकर काम करने निकलीं, उन्हें अपना घर-परिवार चलाने के लिए सहायकों की जरूरत महसूस हुई। इसीलिए सुबह-सवेरे बहुत सी घरेलू सहायिकाएं इन दोहरी आय वाले घरों की तरफ आती दिखती थीं, जहां पति-पत्नी के दफ्तर निकलने से पहले उन्हें घर के सभी काम-काज निपटाने होते थे। घर की साफ-सफाई, खाना पकाना, बरतन मांजना, झाड़-पोंछ, कपड़े धोना, सुखाना, तह बनाना, छोटे बच्चे की देखभाल, स्कूल जाने वाले बच्चे को स्कूल तक या बस तक लाने-ले जाने की जिम्मेदारी, बूढ़ों की देखभाल जैसे कामों को घरेलू सहायक-सहायिकाएं अंजाम देते थे। कई-कई घरों में तो एक से अधिक सहायक काम करते थे। इस तरह के कामों में औरतों की भागीदारी तीन चौथाई थी। इस तरह जहां एक ओर मध्यवर्ग की औरतों के रोजगार बढ़े, वहीं दूसरी तरफ औरतों की घर-गृहस्थी की जिम्मेदारी गरीब स्त्रियों या पुरुषों ने संभाली।

Mumbai Corona Update: Mumbai woos live-in help with more pay, wifi ...लेकिन कोरोना काल में जब से मध्यवर्ग की नौकरियां जा रही हैं, औरतों के रोजगार बड़ी संख्या में घट रहे हैं। ऐसे में घर में काम करने वाली सहायिकाओं की विदाई भी हो रही है। अब अपने आसपास ऐसे दृश्य कम दिखते हैं कि कोई ई-रिक्शा से उतर रही है, कोई साइकिल चलाती आ रही है, कोई तेज कदमों से किसी फ्लैट की तरफ जा रही है। कई महिलाएं कह रही हैं कि उनकी तीस से सत्तर प्रतिशत तक सैलरी कम हो गई है। पति की भी तनख्व्वाह आधी रह गई है। अपना घर ही नहीं चल रहा, तो काम वाली का घर कैसे चलाएं? कुछ महिलाएं कह रही हैं कि इस महामारी ने घरेलू काम करना सिखा दिया है। अपना काम खुद करने की आदत पड़ गई है। जो औरतें वर्क फ्रॉम होम कर रही हैं, उनमें से बहुत सी अब अपने काम खुद करना चाहती हैं। वे पैसे को अब यूं ही उड़ा देना नहीं चाहतीं।

दूसरी तरफ घरेलू सहायिकाओं का कहना है कि जहां वे काम करती थीं, उनमें से बहुत कम लोग अब उन्हें बुलाना चाहते हैं। वे फोन करके उनसे आने के बारे में पूछती हैं, तो वे मना कर देते हैं। मई में समाचार आया था कि दूसरे लॉकडाउन के बाद भारत के मध्यवर्ग में बड़ी बहस छिड़ी कि घरेलू कामवालियों को घर के अंदर आने दें, या न आने दें। एक समय में कामकाजी औरतों के बीच मजाक चलता था कि अगर पति और मेड में से किसी एक को चुनना हो, तो वे मेड को चुनेंगीं। आधिकारिक अनुमान के अनुसार भारत में करीब चालीस लाख घरेलू सहायक-सहायिकाएं हैं, जबकि वैसे इनकी संख्या पांच करोड़ के आसपास बताई जाती है। इनमें 75 फीसद औरतें हैं। लेकिन कोरोना महामारी में मध्यवर्ग के बहुत से घर इन सहायक-सहायिकाओं के बिना चल रहे हैं। ड्राइवर, नैनी, कुक आदि की नौकरियां खत्म हो गई हैं।

हेल्प फॉर यू एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म है जो इन घरेलू सहायक-सहायिकाओं को उनके नियोक्ताओं से जोड़ता है। इसके प्रवक्ताओं का कहना है कि बड़ी संख्या में मेड्स की नौकरियां चली गई हैं। बहुत सी महिलाएं शिकायत कर रही हैं कि उन्हें लॉकडाउन की तनख्व्वाह भी नहीं दी गई। वे कह रही हैं कि क्या खाएं, बच्चों को क्या खिलाएं, उनकी फीस और मकान का किराया कहां से दें? कोविड-19 के लिए जो हेल्पलाइंस बनी हैं, उन पर दिन में कम से कम दस-पंद्रह फोन इन्हीं लोगों के आते हैं, जो मदद की गुहार लगाते हैं। बहुत से सोसाइटी परिसरों में इन्हें अंदर भी नहीं आने दिया जा रहा है, क्योंकि लॉकडाउन भले ही खुल गया हो, मगर कोरोना अभी यहीं है।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं


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