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अमेरिका के और करीब

Edited By Shivendra Suman | नवभारत टाइम्स | Updated:

भारत-चीन संबंधभारत-चीन संबंध

भारत-चीन सीमा पर हुई हिंसक झड़प के बाद से अमेरिका और भारत के रिश्तों में जैसी घनिष्ठता दिखाई दे रही है, उसकी एक झलक बुधवार को आयोजित इंडिया आइडियाज समिट में भी मिली। सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत में निवेश को अमेरिकी निवेशकों के लिए बेहतर विकल्प बताते हुए कहा कि यहां न सिर्फ ज्यादा खुलापन है बल्कि दुनिया के लिए भारत भरोसेमंद भी है।

प्रधानमंत्री ने नाम भले न लिया हो, पर इन दोनों विशेषताओं का चीन में अभाव बताया जाता रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने तो इतना भी संयम बरतना जरूरी नहीं समझा। उन्होंने बाकायदा नाम लेते हुए कहा कि भारत को चीन पर अपनी निर्भरता कम करनी चाहिए। यह भी कि ‘भारत-चीन सीमा पर टकराव की हालिया घटना चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अस्वीकार्य व्यवहार का ताजा नमूना भर है और मुझे पूरा भरोसा है कि अपने सम्मिलित प्रयासों के दम पर हम चीन से अपने हितों की रक्षा कर लेंगे।’

बहरहाल, भारतीय सीमा पर हुई हिंसक घटना को छोड़ भी दें तो पिछले कुछ समय से चीन के व्यवहार को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ी है। ऐसा सिर्फ सामरिक मामलों में ही नहीं, व्यापार से जुड़े मुद्दों पर भी हुआ है। हालांकि 1995 में भूमंडलीकरण की जड़ रोपते वक्त अमेरिका समेत तमाम पश्चिमी देशों ने चीन के साथ व्यापारिक सहयोग बढ़ाने में ही अपना फायदा देखा था। उसके बाद के 15 वर्षों में चीन ने खुद को दुनिया के मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में विकसित किया। फिर 2008-09 की वैश्विक मंदी के बाद इन देशों को अचानक इलहाम हुआ कि चीन ने अपने सस्ते सामानों के बल पर उनके बाजार में पैठ बनाकर उन्हें सिर्फ सहूलियत ही नहीं दी है, साथ में उनके लिए बेरोजगारी का सिरदर्द भी पैदा किया है।

मंदी से मिलकर निपटने का जज्बा कुछ समय तक इस समझदारी को पीछे छोड़ने में सफल रहा, लेकिन एक सीमा के बाद इसे दबाए रखना संभव नहीं रह गया। यही कारण है कि अमेरिकी राजनीति के दोनों पक्ष आज समान रूप से चीन विरोधी हैं। पूर्वी लद्दाख या साउथ चाइना सी में चीन का रुख किसी वजह से नरम हो जाए तो भी भारत या बाकी दुनिया का व्यापारिक समीकरण उसके साथ पहले जैसा नहीं रह पाएगा।

इस बदलाव का फायदा भारत उठाए, यह वक्त की मांग है। सवाल यह है कि चीन पर अपनी निर्भरता कम करते हुए भारत को अमेरिका पर कितना भरोसा करना चाहिए। याद रहे, अभी पिछले साल अमेरिका ने भारत के व्यापारिक हितों के खिलाफ कुछ कदम इतने उग्र ढंग से उठाए थे कि देश में इसके खिलाफ व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिली थी। इस संदर्भ में हाल की समिट में विदेशमंत्री जयशंकर का यह बयान महत्वपूर्ण है, और इससे भारत के संतुलित रुख का संकेत भी मिलता है कि बहुध्रुवीय विश्व के साथ काम करने के लिए अमेरिका को अभी काफी कुछ सीखना है।

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