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बनने के 35 साल बाद भी दल-बदल विरोधी कानून को लेकर इतने संशय की स्थिति क्यों बनी हुई है?

1967 की बात है. साल भर पहले ही पंजाब से कटकर एक अलग राज्य बने हरियाणा में विधानसभा चुनाव हुए थे. कांग्रेस को बहुमत मिला. इसके बाद पिछले एक साल से नये राज्य के अंतरिम मुख्यमंत्री रहे पार्टी नेता भगवत दयाल शर्मा ने पांच साल की उम्मीदों के साथ हरियाणा की सत्ता संभाल ली. लेकिन उनका राज पांच हफ्ते भी न चल सका. सरकार बनने के करीब एक पखवाड़े बाद विधानसभा अध्यक्ष चुनने का वक्त आया तो कांग्रेस विधायकों के एक धड़े ने बगावत कर दी. उस समय हरियाणा में केवल 81 विधानसभा सीटें हुआ करती थीं (आज 90 हैं) जिनमें से 48 कांग्रेस के पास थीं. इस बगावत के चलते कांग्रेस और भगवत दयाल शर्मा को बहुमत और सत्ता से हाथ धोना पड़ा. इसके बाद इन विधायकों की अगुवाई कर रहे राव बीरेन्द्र सिंह ने – जो भगवत दयाल शर्मा की अंतरिम सरकार में विधानसभा अध्यक्ष ही थे – विशाल हरियाणा पार्टी बनाई और विपक्ष के संयुक्त मोर्चे के समर्थन से मुख्यमंत्री बन गए. लेकिन दल-बदल का खेल चलता रहा और करीब आठ महीने बाद उनकी सरकार भी गिर गई. आखिरकार राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया.

इस सारी उथल-पुथल के दौरान हरियाणा की हसनपुर सीट से चुनकर आए एक निर्दलीय विधायक गया लाल ने कुछ ऐसा काम किया जो आने वाले वक्त में भारतीय राजनीति के संदर्भ में खूब इस्तेमाल होने वाला मुहावरा बनने वाला था. अपनी जीत के तुरंत बाद गया लाल कांग्रेस में शामिल हो गए. यही नहीं, इसके एक पखवाड़े के भीतर ही उन्होंने तीन बार पार्टियां बदलीं. गया लाल पहले कांग्रेस से संयुक्त मोर्चे में गए, फिर वापस कांग्रेस में आए और इसके कुछ ही घंटे बाद फिर संयुक्त मोर्चे में चले गए. जब वे संयुक्त मोर्चे से वापस कांग्रेस में आए तो पार्टी के एक नेता ने कहा कि ‘गया राम अब आया राम’ हो गए हैं. इसके बाद जब वे फिर संयुक्त मोर्चे में चले गए तो संसद में तत्कालीन गृह मंत्री यशवंत राव चव्हाण ने चुटकी ली कि ‘आया राम, गया राम’ हो गया. इसके बाद दल-बदल की घटनाओं के दौरान ‘आया राम, गया राम’ का यह मुहावरा आम हो गया.

अवसरवादी राजनीति के विस्तार के साथ देश में ऐसी घटनाएं भी तेज होने लगी थीं. 1980 के दशक में हरियाणा में तो यह हाल था कि वहां के तत्कालीन राज्यपाल जीडी तापसे को कहना पड़ा कि राज्य में विधायक इस तरह पार्टियां बदल रहे हैं जैसे कोई कपड़े बदलता है. दल-बदलुओं की बढ़ती संख्या और इससे पैदा होने वाली राजनीतिक अस्थिरता के चलते इस दिशा में कोई कानून बनाने की मांग भी उठने लगी. इसका नतीजा 1985 में संविधान में 52वें संशोोधन यानी आसान भाषा में कहें तो दल-बदल विरोधी कानून के रूप में सामने आया. इस कवायद के तहत संविधान में एक दसवीं अनुसूची जोड़ी गई. इसमें वह प्रक्रिया निर्धारित की गई जिसके जरिये सदन के किसी सदस्य की शिकायत के बाद सदन का अध्यक्ष, विधायकों या सांसदों को दल-बदल के आधार पर अयोग्य घोषित कर सकता है.

दल-बदल विरोधी कानून के वर्तमान स्वरूप के मुताबिक किसी राजनीतिक दल से ताल्लुक रखने वाले सदन के किसी सदस्य को निम्नलिखित परिस्थितियों में अयोग्य घोषित किया जा सकता है:

(1) अगर उसने अपने राजनीतिक दल की सदस्यता खुद ही छोड़ दी हो.

(2) या फिर उसने सदन में किसी मुद्दे पर मतदान के समय अपनी पार्टी या इसके द्वारा तय किए गए किसी व्यक्ति या प्राधिकारी (व्हिप या सचेतक) के निर्देश की अवहेलना की हो (यानी उसने पार्टी के निर्देश के खिलाफ वोट किया हो या अपना वोट डाला ही न हो). लेकिन अगर उसने ऐसा करने के लिए पार्टी से पहले ही अनुमति ले ली हो या फिर पार्टी या इसके द्वारा तय किए गए किसी व्यक्ति या प्राधिकारी ने उसके ऐसा करने के 15 दिन के भीतर इस कदम को स्वीकृति दे दी हो तो यह नियम लागू नहीं होता है.

कुछ अन्य विशेष परिस्थितियों में भी पार्टी से बगावत करने वाले किसी सदस्य की विधायकी या सांसदी बची रह सकती है. कानून के मुताबिक अगर किसी पार्टी के कम से कम दो तिहाई सदस्य अलग होकर कोई गुट बना लें या किसी दूसरी पार्टी के साथ मिल जाएं तो उनकी सदस्यता बची रहेगी.

वैसे 1985 में जब यह कानून बना था तो मूल प्रावधान यह था कि अगर किसी पार्टी के एक तिहाई विधायक या सांसद बगावत करके अलग होते हैं तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी. लेकिन इसके बाद भी बड़े पैमाने पर दलबदल की घटनाएं जारी रहीं तो 2003 में संविधान में 91वां संशोधन किया गया और दल-बदल कानून में बदलाव कर इस आंकड़े को दो तिहाई कर दिया गया.

संविधान की दसवीं अनुसूची के छठे खंड के मुताबिक दल-बदल के मामले में निर्णय का अधिकार सदन के अध्यक्ष को दिया गया है. कई विशेषज्ञों का मानना है कि दल-बदल के आधार पर किसी सदस्य को अयोग्य घोषित करने का फैसला सदन के अध्यक्ष को नहीं करना चाहिए. उनके मुताबिक सांसदों के मामले में यह अधिकार राष्ट्रपति और विधायकों के मामले में राज्यपाल के पास होना चाहिए जैसा कि लाभ के पद के मामले में होता है. इस मामले में राष्ट्रपति या राज्यपाल चुनाव आयोग के सुझाव पर गौर करने के बाद फैसला देते हैं.

विशेषज्ञों के ऐसा मानने की एक वजह यह भी है कि तब खुद सदन के अध्यक्ष के दल बदलने के मामले में दल-बदल की कार्यवाही की प्रक्रिया को बदलना नहीं पड़ेगा. अभी अध्यक्ष के मामले में कोई निर्णय लेने के लिए सदन को अपने एक सदस्य को चुनना होता है.

हालांकि कई जानकारों का यह भी कहना है कि राज्यों की दल-बदल की कार्यवाही राज्यपालों के हाथों में दे देने से यह केंद्र की मर्जी की गुलाम बन जाएगी. फिलहाल यह राज्यों की सत्ताधारी पार्टियों के पक्ष में है जो अपने विधायकों में से किसी एक को विधानसभा अध्यक्ष चुनती हैं. जानकारों का मानना है कि यह भी आदर्श स्थिति नहीं है लेकिन बेहतर इसलिए है क्योंकि अभी इस पूरी प्रक्रिया पर सिर्फ केंद्र सरकार या उसे चलाने वाली पार्टी का नियंत्रण नहीं है. यानी कि वर्तमान स्थिति हमारे संघीय ढांचे के हिसाब से है.

फिलहाल दल-बदल विरोधी कानून राजस्थान में सत्ताधारी कांग्रेस के भीतर मची उथल-पुथल के चलते चर्चा में है. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री, दोनों पदों से हटाए जा चुके सचिन पायलट समेत कांग्रेस के 19 विधायकों को अयोग्य घोषित करने के संबंध में विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी ने उन्हें कारण बताओ नोटिस भेजा है. सचिन पायलट इसके खिलाफ हाई कोर्ट पहुंचे थे जिसने मामले की सुनवाई पूरी करते हुए 24 जुलाई के लिए फैसला सुरक्षित रख लिया है. हाई कोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष को तब तक कोई कार्रवाई न करने के निर्देश दिए हैं. उधर, अध्यक्ष सीपी जोशी इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं. उनका कहना है कि फैसला कब और कैसे करना है, यह उनका संवैधानिक अधिकार है और इसमें अदालत का कोई काम नहीं है.

सचिन पायलट प्रकरण की तरह पहले भी दल-बदल विरोधी कानून से जुड़े मामले अदालतों में जाते रहे हैं और अदालतें इनके अलग-अलग पहलुओं की व्याख्या करती रही हैं. मसलन कानून यह तो साफ-साफ कहता है कि स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ने पर या सदन में अपनी पार्टी की इच्छा के दाएं-बाएं मतदान करने पर किसी सांसद या विधायक को अयोग्य घोषित किया जा सकता है. लेकिन राजस्थान की तरह तब क्या हो जब कोई सदस्य बागी की तरह बर्ताव तो कर रहा हो लेकिन न तो उसने पार्टी से इस्तीफा दिया हो और न ही उसके सदन में पार्टी लाइन के खिलाफ वोट करने की नौबत आई हो?

सुप्रीम कोर्ट ने इसका जवाब दिया है. 1994 के ‘रवि एस नाइक बनाम भारत सरकार’ मामले में शीर्ष अदालत ने कहा था कि सिर्फ इस्तीफा यह तय करने का आधार नहीं हो सकता कि संबंधित सदस्य ने स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है. सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक औपचारिक रूप से इस्तीफा न देने पर भी किसी सदस्य के बर्ताव से ऐसा निष्कर्ष निकाला जा सकता है. राजस्थान में कांग्रेस के मुख्य सचेतक महेश जोशी ने सचिन पायलट और उऩके समर्थक विधायकों को अयोग्य घोषित करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष को दी गई अपनी याचिका में 1994 के इसी मामले का हवाला दिया है. उनका कहना है कि विधायक दल की बैठक में आने के पार्टी के आदेश की अवहेलना जैसी गतिविधियों के चलते इन विधायकों पर दल-बदल विरोधी कानून लग सकता है और उनकी सदस्यता रद्द की जा सकती है.

ऐसा शरद यादव और अली अनवर के मामले में हो भी चुका है. राज्य सभा के सदस्य रहे जेडीयू के इन दोनों पूर्व नेताओं को उपराष्ट्रपति वेंकैय्या नायडू ने अयोग्य करार दे दिया था. पार्टी मुखिया नीतीश कुमार ने इस आधार पर उनकी सदस्यता रद्द करने की अपील की थी कि ये दोनों नेता उनके निर्देशों का उल्लंघन कर विपक्षी दलों की एक रैली में शामिल हुए थे.

दल-बदल विरोधी कानून में पहले यह प्रावधान था कि सदन के मुखिया द्वारा उठाए गए कदमों की कोई न्यायिक समीक्षा नहीं हो सकती. लेकिन 1992 में एक मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया. हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि न्यायिक दखल तभी होना चाहिए जब सदन का अध्यक्ष अपना फैसला दे चुका हो. 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसी याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया था जिसमें आरोप लगाया गया था कि विधानसभा अध्यक्ष दल-बदल कानून के तहत एक सदस्य के खिलाफ कार्रवाई करने में जान-बूझकर देरी कर रहे हैं.

यहीं एक अहम सवाल उठता है कि ऐसे किसी मामले में सदन के मुखिया को फैसला करने में कितना समय लेना चाहिए? कानून में इसके लिए कोई समयावधि तय नहीं की गई है. यानी ऐसे मामलों में याचिकाकर्ता के पास सदन के अध्यक्ष के फैसले का इंतजार करने के सिवाय कोई चारा नहीं होता. कर्नाटक में बीते साल हुई उथल-पुथल इसका उदाहरण है. वहां सत्ताधारी जेडीएस और कांग्रेस के कई विधायकों ने इस्तीफा दे दिया था और विधानसभा अध्यक्ष ने लंबे समय तक इसे स्वीकार नहीं किया था. सुप्रीम कोर्ट के कहने के बाद भी वे मामला लटकाते रहे थे. बाद में उन्होंने 17 बागी विधायकों को पूरी विधानसभा के कार्यकाल के लिए अयोग्य घोषित कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले की समीक्षा करते हुए इसका बागी विधायकों को अयोग्य घोषित करने वाला हिस्सा तो बरकरार रखा, लेकिन उन्हें बीते साल दिसंबर में हुआ उपचुनाव लड़ने की इजाजत दे दी. इसके बाद इनमें से कई बागी विधायक भाजपा के टिकट पर मैदान में उतरे और जीते भी.

ऐसे भी उदाहरण हैं जिनमें अदालतों ने अयोग्यता से जुड़े फैसले पर सदन के अध्यक्ष द्वारा बहुत देर होने पर असाधारण फैसला दिया. मणिपुर में भाजपा नेता और राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे टी श्यामकुमार का ही मामला लें. 2017 के विधानसभा चुनाव में श्यामकुमार कांग्रेस के टिकट पर लड़े और जीते. नतीजे आने के बाद वे भाजपा में शामिल हो गए और बीरेन सिंह सरकार में मंत्री बन गए. कांग्रेस ने विधानसभा अध्यक्ष से उन्हें अयोग्य घोषित करने की मांग की. लेकिन उन्होंने लंबे समय तक इस पर कोई फैसला नहीं किया. इसके बाद अंसतुष्ट कांग्रेस हाई कोर्ट पहुंची. जब उसे वहां से राहत नहीं मिली तो उसने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली.

इसी साल 21 जनवरी को इस मामले में फैसला सुनाते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष एक महीने के भीतर श्यामकुमार की अयोग्यता पर फैसला करें. जब उन्होंने ऐसा नहीं किया तो कोर्ट ने एक अप्रत्याशित कदम उठाया. उसने श्यामकुमार के मणिपुर विधानसभा के भीतर घुसने पर रोक लगा दी और तत्काल प्रभाव से उनका कैबिनेट मंत्री का दर्जा खत्म करने का आदेश दिया. सुप्रीम कोर्ट के इस अभूतपूर्व फैसले के बाद मार्च में विधानसभा अध्यक्ष ने श्यामकुमार को अयोग्य घोषित कर दिया. इसके बाद हाई कोर्ट भी हरकत में आया. उसने बीते जून में आदेश दिया कि 2017 के चुनावों के बाद श्यामकुमार के साथ कांग्रेस छोड़कर भाजपा में गए सात विधायकों को अयोग्य घोषित करने से जुड़ी याचिका पर जब तक अध्यक्ष फैसला नहीं देते तब तक ये विधायक विधानसभा में प्रवेश नहीं कर सकेंगे.

बागी विधायकों के इस्तीफे स्वीकार करने के लिहाज से विधानसभा अध्यक्ष के लिए कोई समयावधि तय होना एक ऐसा मुद्दा है जिस पर अदालतें समय-समय पर चिंता जताती रही हैं, खास कर जब ऐसे फैसलों में देर गैरजरूरी दिख रही हो. तीन साल पहले जेडीयू के दो सांसदों को अयोग्य घोषित करते हुए राज्य सभा के सभापति वेंकैय्या नायडू ने कहा था कि इस तरह की याचिकाओं पर सदन के अध्यक्ष को तीन महीने के भीतर फैसला ले लेना चाहिए. लेकिन श्यामकुमार जैसे भी मामले हैं जब पार्टी से बगावत के लंबे समय बाद तक भी न केवल वे सदन के सदस्य बल्कि दूसरी पार्टी की सरकार में मंत्री भी बने रहे. ऐसी भी हास्यास्पद स्थितियां देखने को मिली हैं जब विपक्ष का कोई बागी सदस्य सरकार में मंत्री बन गया लेकिन, सदन में उसकी सदस्यता पुरानी पार्टी के नाम से ही बनी रही.

इस सिलसिले में तेलंगाना का विशेष रूप से जिक्र किया जा जा सकता है. वहां कुछ साल पहले विपक्षी टीडीपी के सदस्य धीरे-धीरे कर सत्ताधारी टीआरएस में शामिल होते गए, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष ने उनकी अयोग्यता पर फैसला लटकाए रखा. आखिरकार जब टीडीपी के 15 में से 12 विधायक टीआरएस में आ गए तो जून 2016 में अध्यक्ष ने यह कहते हुए इसे मान्यता दे दी कि उनके इस मामले पर फैसला लेते वक्त दो तिहाई से ज्यादा विधायक पार्टी छोड़ चुके थे. ऐसी सियासी करामातों के चलते दल-बदल के मामलों में सदन के अध्यक्ष द्वारा निर्णय लेने की समय-सीमा निर्धारित करने की मांग भी समय-समय पर उठती रही है.

दल-बदल विरोधी कानून पर बहस का एक पक्ष नैतिकता से भी जुड़ता है. कई लोग मानते हैं कि सरकारों की स्थिरता सुनिश्चित करने के मकसद से बनाया गया यह कानून सदन में वोटिंग के दौरान विधायकों या सांसदों को अपने विवेक या फिर अपने मतदाताओं के हितों के हिसाब से फैसला करने से भी रोकता है. इन विश्लेषकों के मुताबिक संसद या विधानसभा का काम सरकार पर नजर रखना है, और अगर किसी सदस्य को उसकी पार्टी सदन में किसी मुद्दे के समर्थन में या इसके खिलाफ वोट करने के लिए बाध्य करती है तो वह बात इस मूल भावना के विपरीत जाती है. इसलिए कई विशेषज्ञों का सुझाव है कि दल-बदल विरोधी कानून सिर्फ उन मामलों में लागू होना चाहिए जिन पर वोटिंग से किसी सरकार की स्थिरता पर असर पड़ता हो.

इस कानून के विरोध में एक और तर्क दिया जाता है. कई मानते हैं कि इसके चलते किसी पार्टी के भीतर के लोकतंत्र पर बुरा असर पड़ता है क्योंकि इससे पार्टी लाइन से अलग राय रखने वाले किसी सांसद या विधायक का ऐसा करना मुश्किल हो जाता है. संवाद लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा है, लेकिन दल-बदल विरोधी कानून की वजह से ऐसे विचार दब सकते हैं जो पार्टी के बहुमत की राय से अलग होने पर भी महत्वपूर्ण होते हैं. संविधान में लोकतंत्र को जनता का, जनता के लिये और जनता द्वारा शासन कहा गया है. लेकिन बहुत से जानकार मानते हैं कि यह कानून जनता के बजाय पार्टियों या दूसरे शब्दों में कहें तो उनके हाईकमान के शासन को बढ़ावा देता है.

कुछ विश्लेषकों का यह भी तर्क है कि कई परिपक्व लोकतंत्रों में दल-बदल विरोधी कानून जैसी कोई व्यवस्था नहीं है. मसलन इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे देशों में अगर जनप्रतिनिधि अपने दलों के उलट राय जाहिर करते हैं या फिर पार्टी लाइन से अलग जाकर वोट करते हैं, तो भी उनकी सदस्यता खतरे में नहीं पड़ती.

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