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यूरोपीय यूनियन: महामारी और कड़वाहट

Edited By Shivendra Suman | नवभारत टाइम्स | Updated:

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बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में चल रही यूरोपियन यूनियन की बैठक में जिस तरह के तीव्र मतभेद सामने आए हैं और जिन तीखे शब्दों के जरिये वे प्रकट हुए हैं, वह कोई सामान्य बात नहीं है। ईयू देशों की इस बैठक में और बातों के अलावा 1800 अरब यूरो (2100 अरब डॉलर) के बजट और रिकवरी फंड पर भी बहस चल रही है।

कोविड-19 से जूझते जरूरतमंद पूर्वी-दक्षिणी यूरोपीय देशों के लिए रिकवरी फंड को जरूरी माना जा रहा है। सैद्धांतिक रूप से सभी देश इस पर सहमत भी थे, लेकिन जैसे ही बैठक शुरू हुई और उसमें फ्रांस तथा जर्मनी की ओर से यह प्रस्ताव रखा गया कि रिकवरी फंड (750 अरब यूरो) का अधिक से अधिक हिस्सा (500 अरब यूरो) महामारी से पीड़ित देशों को सहायता के रूप में दिया जाए, इस पर मतभेद उभरने लगे। दक्षिण यूरोपीय देश- इटली और स्पेन इसके पक्ष में थे, लेकिन फ्रूगल (कंजूस) फोर के नाम से जाने जा रहे चार देश- ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, स्वीडन और नीदरलैंड्स इसके तीव्र विरोध में सामने आ गए।

नीदरलैंड्स के प्रधानमंत्री मार्क रट ने साफ-साफ कह दिया कि अपनी संसद की मंजूरी के बगैर वे अपने देश पर कर्ज का कोई बोझ नहीं डाल सकते, वह भी इसलिए कि सदस्य देशों को कैश बांटना है! इस पर हंगरी के दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बान ने कहा कि मार्क रट पुराने कम्युनिस्ट शासकों जैसा आचरण दिखा रहे हैं। निजी टिप्पणियों से भरी यह तीखी बहस थमने का नाम ही नहीं ले रही थी।

विवाद रिकवरी फंड की मात्रा पर ही नहीं, उसके साथ जोड़ी जाने वाली शर्तों पर भी था। हाल यह रहा कि बैठक का समय बार-बार बढ़ाया जाता रहा, लेकिन सहमति की कोई सूरत बनती नजर नहीं आई। शनिवार को समाप्त होने वाली बैठक रविवार और फिर सोमवार को भी चलती रही, लेकिन आखिर तक इसमें शामिल नेता यह कहने की स्थिति में नहीं थे कि उनके बीच सहमति बन ही जाएगी।

लक्जमबर्ग के प्रधानमंत्री जेवियर बेटेल ने यहां तक कह दिया कि ईयू मीटिंग्स में शामिल होने के अपने सात साल के अनुभव में ऐसा तीखा मतभेद उन्होंने कभी नहीं देखा। बहरहाल, बैठक का अंत चाहे जैसा भी हो, इन चार दिनों में इसमें जो कुछ होता हुआ दिखा है वह इस मान्यता को ध्वस्त करने के लिए काफी है कि ब्रिटेन के अलग होने के बाद ईयू का सबसे बड़ा संकट खत्म हो गया और अब उसे शांति तथा सहमति से चलाना मुश्किल नहीं होगा। 1993 में ईयू का गठन राष्ट्रों की सीमाएं कमजोर पड़ने की दिशा में एक ठोस कदम माना गया था।

दुनिया के एक ग्लोबल विलेज बनने के सपनों को इसने पंख लगा दिए थे। यूरोपीय संसद की यह बैठक अभी खत्म नहीं हुई है, लेकिन महामारी जैसे पहले वास्तविक संकट के सामने इसमें नजर आई कटुता उन सबके लिए तकलीफदेह है जो राष्ट्रों की सीमाओं में बंटी तनावग्रस्त दुनिया की जगह आपसी सहयोग, विश्वास और प्रेम से संचालित विश्व के सपने से जुड़ाव महसूस करते रहे हैं।

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