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बेहतर संयुक्त राष्ट्र

Edited By Shivendra Suman | नवभारत टाइम्स | Updated:

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र की उच्च स्तरीय आर्थिक व सामाजिक परिषद की बैठक में यूएन के पुनर्गठन का मुद्दा जोरदार ढंग से उठाया। ध्यान रहे, संयुक्त राष्ट्र अपनी स्थापना के 75वें साल में है। प्रधानमंत्री ने खास तौर पर इस मौके का जिक्र करते हुए कहा कि यह सही समय है जब यूएन को ज्यादा प्रासंगिक और ज्यादा उपयोगी बनाने पर विचार किया जाए। इस सचाई से तो कोई मुंह नहीं चुरा सकता कि आज की दुनिया द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की दुनिया से बहुत अलग है। बीच में बनी दो ध्रुवीय विश्व व्यवस्था भी अतीत की बात हो चुकी है।

गुटनिरपेक्ष आंदोलन कहां दफन हुआ, कोई नहीं जानता। शीतयुद्ध कब का समाप्त हो चुका है, हालांकि गृहयुद्ध दुनिया के कई इलाकों की पहचान बने हुए हैं। परमाणु शक्ति संपन्न पांच देशों के अलावा कई सारे देश न केवल यह शक्ति हासिल कर चुके हैं बल्कि अपनी आर्थिक साख बढ़ाकर विश्व रंगमंच पर अहम भूमिका भी निभा रहे हैं। ऐसे में दुनिया की सबसे बड़ी पंचायत संयुक्त राष्ट्र की प्रभावी भूमिका सुनिश्चित करने के लिए उसमें आज के दौर का शक्ति संतुलन जाहिर होना चाहिए। लेकिन इसके साथ सबसे अहम सवाल यह जुड़ा हुआ है कि संयुक्त राष्ट्र की पुनर्रचना के लिए दबाव बना रहे देशों की तरफ से क्या अभी अन्याय के खिलाफ कोई आवाज उठ रही है, जिससे पता चले कि यूएन के बदले हुए स्वरूप के जरिये वे एक अधिक न्यायसंगत दुनिया की बुनियाद रचेंगे?

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के दौर में विश्व व्यवस्था भले दो ध्रुवीय रही हो, पर ऐसे देश और नेता मौजूद थे जो दोनों महाशक्तियों के गलत कदमों की खुलकर निंदा करते थे और इससे होने वाला नुकसान भी खुशी-खुशी कबूल करते थे। गुटनिरपेक्षता की वकालत करने वाले ये नेता मानते थे कि अगर सही का समर्थन और गलत का विरोध करने की वजह से उनका देश थोड़ा पिछड़ता भी है तो आगे चलकर वह पिछड़ापन दूर किया जा सकता है, लेकिन अगर देश का सामूहिक विवेक सो जाएगा तो उसकी भरपाई लाख विकास करके भी नहीं की जा सकती। ऐसे देश और ऐसे नेता आज कहीं नहीं दिख रहे।

स्वाभाविक है कि ताकतवर देशों के राष्ट्राध्यक्षों को अपनी मनमानी पर अंकुश लगाने वाली कोई शक्ति, कोई शख्सियत कहीं भी नजर नहीं आती। न देश में न विदेश में। अलबत्ता एक अच्छी बात इधर यह हुई है कि अंतरराष्ट्रीय सामूहिक विवेक को जगाने वाले कई सारे कारक आज दुनिया में मौजूद हैं। सोशल मीडिया ने एक ऐसा ऑडिएंस तैयार कर दिया है जो छोटे से छोटे जन समुदाय के कष्ट की भी अनदेखी नहीं होने देता। जो देश की सीमा से ऊपर उठकर मसलों को देख सकता है और उन पर खुलकर बहस कर सकता है।

सूचनाएं अब भुलावे की गलियों में भटकने को मजबूर नहीं हैं। ऐसे में कुछ देश, कुछ राजनेता अगर एक अधिक मानवीय संयुक्त राष्ट्र बनाने की चर्चा शुरू करें तो आने वाले दिनों में बिना किसी महाशक्ति के रहमोकरम के भी इस बदलाव को आकार दिया जा सकता है।

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