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देश ही नहीं, दुनिया का खाका बदलेगा कोरोना

लेखक: दीपक कुमार सिंह।।
कोरोना महामारी अभूतपूर्व है। यह न केवल तेजी से फैल रही है बल्कि अब तक की किसी भी महामारी के मुकाबले ज्यादा कहर भी बरपा रही है। इसके आर्थिक प्रभावों को ज्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन इसके राजनीतिक प्रभाव भी कम गंभीर नहीं हैं। खास तौर पर इससे निपटने के लिए अपनाए गए कई अल्पावधि उपायों का प्रभाव राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय शासन व्यवस्था के साथ-साथ राजनीतिक विचारधाराओं पर भी लंबे अरसे तक देखने को मिल सकता है।

चौथे ‘आर’ का जुड़ना
किसी आपदा से निपटने के लिए आम तौर पर जो कदम उठाए जाते हैं उनमें तीन ‘आर’ होते हैं- रेस्क्यू (बचाव), रिलीफ (राहत) और रीहैबिलिटेशन (पुनर्वास)। कोविड-19 के मामले में एक चौथा ‘आर’ भी जुड़ गया है, जिसने अन्य तीनों को महत्वहीन बना दिया है। वह है रेग्यूलेशन (नियमन)। लॉकडाउन के सख्त आदेश से सभी प्रकार की गतिविधियां ठप पड़ गईं। व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सभी आयामों को नियमों में बांधने से अर्थव्यवस्था की गाड़ी के पहिये अचानक थम गए। पूरे देश में महज नियमों की रूपरेखा एक नहीं थी। इसे थोपने का तरीका भी एक जैसा ही था। विधायिका और अन्य हितधारकों की सहमति लिए बगैर कार्यपालिका ने संपूर्ण शक्ति अपने हाथ में ले ली।

कार्यपालिका के आदेशों के जरिए ही महामारी से निपटने के कदम उठाए गए। समाज के विभिन्न स्तरों पर अचानक आई आर्थिक बाधाओं के प्रभाव में अंतर होने से अमीर और गरीब, शहरी और ग्रामीण, स्थानीय और प्रवासी, नियोक्ता और कर्मचारी आदि के बीच मौजूद सामाजिक भ्रंश-रेखाएं गहरी हो गईं। इस संकट ने महामारी की रोकथाम में अमेरिका, जर्मनी और इटली जैसे बड़े लोकतांत्रिक देशों के मुकाबले सर्वसत्तावादी तंत्र की प्रभावशीलता पर बहस को भी तेज कर दिया, क्योंकि इन देशों की कोशिशें डगमगा गईं जबकि सिंगापुर और वियतनाम की सर्वसत्तावादी व्यवस्थाएं इससे निपटने में कामयाब रहीं। इसके प्रभावों का अनुमान लगाएं तो पहली चीज आती है शक्ति का केंद्रीकरण। हंगरी, फिलीपींस, चीन, अल सल्वाडोर और युगांडा में सत्ताधारी वर्ग ने इस संकट का उपयोग करते हुए अपने हाथ में आपातकालीन शक्तियां ले लीं।

thank you coronavirus helpers: Coronavirus helpers get hearts & a ...भारत में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन कानून लागू करने से शक्तियां राष्ट्रीय कार्यपालिका के पास केंद्रीकृत हो गईं। मौलिक अधिकारों को सीमित कर दिया गया और सरकार की चौकसी बढ़ गई, जबकि विरोध-प्रदर्शन गायब हो गए। हंगरी, जॉर्डन, चिली, थाइलैंड जैसे अनेक देशों में झूठी खबर फैलाने के लिए दंड का प्रावधान किया गया ताकि किसी प्रकार के विरोध के स्वर को बंद करने में दिक्कत न हो। इजरायल, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर में आक्रामक निगरानी प्रणाली को संक्रमण को काबू करने के कारगर उपाय के रूप में देखा जा रहा है। एक अन्य पहलू यह है कि महामारी से निपटने में सरकार की मजबूत और मुख्य भूमिका को देखते हुए नव-उदारवादी प्रवृत्ति का प्रभाव कम हो सकता है, जिसमें राज्य की भूमिका कम से कम मानी जाती है।

मौजूदा संकट के अनुभव को ध्यान में रखते हुए यह तर्क देना मुश्किल होगा कि निजी क्षेत्र और उदार दानदाता राष्ट्रीय आपातकाल के समय सक्षम सरकार का विकल्प बन सकते हैं। हालांकि यह तर्क दिया जा सकता है कि ये आपातकालीन उपाय हैं और अभूतपूर्व स्थितियों से निपटने के लिए सख्ती बरतना जरूरी होता है। लेकिन निश्चित तौर पर कोई भी यह कहने की स्थिति में नहीं है कि संकट समाप्त होने पर इन उपायों से छुटकारा मिल ही जाएगा। और, बात सिर्फ सर्वसत्तावादी व्यवस्था की नहीं है। सत्ताधारी वर्ग की सहूलियत को देखते हुए लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारें भी उसी तरह या बदले स्वरूप में आपातकालीन उपायों को जारी रख सकती हैं, ताकि शक्तियां केंद्रित रहें और हुकूमत पर उनकी पकड़ बनी रहे। सबसे बड़ा खतरा निगरानी के लिए उन्नत प्रौद्योगिकी के उपयोग से हो सकता है क्योंकि सामान्य परिस्थिति में भी इसका दुरुपयोग किया जा सकता है।

मौजूदा संकट से नई वैश्विक-व्यवस्था के भविष्य पर भी बहस छिड़ गई है। विश्व व्यवस्था पर इस महामारी के दो तरह के प्रभाव हो सकते हैं। पहला, शक्तियों का संतुलन बदल सकता है और इसके फलस्वरूप अंतरराष्ट्रीय संगठनों पर वर्चस्व का स्वरूप बदल सकता है। दूसरा, इससे वैश्विक सहयोग की तुलना में पृथकतावाद और उदार लोकतंत्र की तुलना में सर्वसत्तावाद की विचारधारा को प्रोत्साहन मिल सकता है। शक्तियों का वैश्विक संतुलन अमेरिका और यूरोप के हाथ से खिसक सकता है, क्योंकि इस आपदा को रोकने में ये एशियाई देशों के सामने फिसड्डी साबित हुए हैं। वहीं, चीन पहले से ही आर्थिक-व्यवस्था, वैश्विक व्यापार संतुलन और आपूर्ति शृंखला में वर्चस्व हासिल करने की दिशा में काम कर रहा है।

डेट ट्रैप डिप्लोमेसी (कर्ज के जाल में फंसाने की कूटनीति) के जरिए अफ्रीका और एशिया के विकासशील देशों के सत्ताधारियों पर चीन अपने प्रभाव का विस्तार कर रहा है और हाल में संयुक्त राष्ट्र के कुछ संस्थान भी उसके प्रभाव में चले गए हैं। कोविड-19 से चीन के इस रवैये को प्रोत्साहन ही मिला है। वैश्विक आपूर्ति शृंखला बाधित होने और वैश्विक सहयोग सुनिश्चित करते हुए संकट से निपटने का रास्ता निकालने में अंतरराष्ट्रीय संगठनों के विफल रहने के अलावा सरकारों की अग्रणी भूमिका और केंद्रीकरण की उभरती प्रवृत्तियों के चलते भी पूरी दुनिया में राष्ट्रवादी, पृथकतावादी और अनुदार विचारधाराओं का प्रभुत्व बढ़ सकता है।

अमेरिकी हिचकिचाहट
निष्कर्ष के तौर पर हम यह कह सकते हैं कि समाज के विखंडित होने के कारण राष्ट्रीय स्तर पर हमें सर्वसत्तावादी और केंद्रीयतावादी प्रवृत्तियों में बढ़त देखने को मिल सकती है। दूसरी तरफ, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी नीति में बदलाव नहीं होने और उदार लोकतंत्रों को सहारा देने में अमेरिकी हिचकिचाहट से चीन के लिए उभरती हुई वैश्विक व्यवस्था में अपना वैचारिक, तकनीकी और राजनीतिक-आर्थिक वर्चस्व कायम करने का मार्ग प्रशस्त होगा। महामारी से निपटने में वैश्विक सहयोग की विफलता से अंधराष्ट्रवादी और पृथकतावादी प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय संगठनों की प्रभाव क्षमता और कम हो सकती है।

(लेखक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं


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