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आज 38 साल की हो रहीं प्रियंका चोपड़ा की पहली फिल्म ‘द हीरो’ देखना कैसा अनुभव है

‘द हीरो – लव स्टोरी ऑफ अ स्पाय’ का शुरुआती आधा घंटा गुजरने के बाद जब क्रेडिट लाइन आना शुरू होती है तो सनी देओल, प्रिटी जिंटा के बाद बमुश्किल चार सेकंड के लिए स्क्रीन पर ‘इंट्रोड्यूसिंग – प्रियंका चोपड़ा’ लिखा नजर आता है. लेकिन इसके डेढ़ घंटे बाद तक प्रियंका चोपड़ा की कोई खैर-खबर नहीं मिलती.

करीब पौने दो घंटे की फिल्म गुजरने के बाद वह मौका आता है जब प्रियंका चोपड़ा पहली बार स्क्रीन पर नजर आती हैं, बिजनेस सूट और ब्लंट हेयरकट के साथ चश्मा लगाए डॉक्टर शाहीन के रूप में. डॉ शाहीन को देखते ही आपको एक पढ़ी-लिखी, समझदार औरत की झलक मिलती है और यह झलक प्रियंका चोपड़ा के व्यक्तित्व से मेल खाती है. शायद यह भूमिका उन्हें मिलने की वजह यही रही हो और फिर कुल मिलाकर शुरुआती दो-तीन दृश्यों से यह समझा सकता है कि वे इस किरदार के लिए एकदम सही चयन थीं. लेकिन यह फिल्म उनके लिए कितनी सही थी, इसकी बात कभी और करेंगे!

अनिल शर्मा के निर्देशन में बनी अति का हीरोइज्म दिखाने वाली यह तीन घंटे लंबी फिल्म देखना अपने आप में कोई बहुत अच्छा अनुभव नहीं कहा जा सकता. लेकिन यहां पर प्रियंका चोपड़ा अपनी छोटी सी भूमिका में जो करती हैं वह जरूर फिल्म को कुछ अच्छा दे देता है. शाहीन की यह भूमिका कोई और अभिनेत्री भी निभा सकती थी, लेकिन उस ग्रेसफुल अंदाज में नहीं जिस तरह प्रियंका चोपड़ा ने निभाई है. द हीरो की रिलीज से दो-ढाई साल पहले ही मिस वर्ल्ड-2000 बनने वाली प्रियंका चोपड़ा फिल्म में बेहद सेक्सी नजर आने के साथ-साथ अच्छे से जरा ही कम कहा जा सकने वाला अभिनय करती हैं. हालांकि उनका यह अभिनय इस बात का भरोसा नहीं दिला पाता कि आने वाले वक्त में वे ‘कमीने’ में मस्त-मराठी मुलगी या ‘बाजीराव’ में काशीबाई बनकर लोगों का दिल जीत लेने वाली हैं. फिर भी उनका स्टाइल इस बात का अंदाजा तो दे ही देता है कि भविष्य में वे ‘फैशन’ जैसी फिल्म के लिए भी सही चयन साबित होंगी.

अगर आप डॉ शाहीन में ‘बरफी’ की झिलमिल को ढूंढ़ना चाहें तो आपको मुश्किल हो सकती है लेकिन इस किरदार में ‘क्वांटिको’ की एलेक्स पेरिश बड़ी आसानी से मिल सकती है. विदेश में रहने वाली पाकिस्तानी लड़की बनकर प्रियंका चोपड़ा यहां गैर-भारतीय उच्चारण वाली अंग्रेजी बोलती हैं और हद-कॉन्फिडेंट नजर आती हैं. लेकिन इतने भर से तब यह कह पाना कि वे कल हॉलीवुड में भी नायिका की भूमिका कर सकती हैं, नामुमकिन था. हां, अब जब वे बॉलीवुड की हॉलीवुड पहुंचने वाली हसरतों को चेहरा बन चुकी हैं तो इस बात का एहसास होता है कि एक घोर-मसाला बॉलीवुड फिल्म में अति-क्लीशे किरदार से अपने करियर की शुरुआत करने वाली यह अभिनेत्री क्या थी.

द हीरो में अगर प्रियंका चोपड़ा की कमियों की बात करें तो सबसे बड़ी कमी उनकी संवाद अदायगी में दिखती है. अंग्रेजी में भी वे उच्चारण तो एकदम सही पकड़ती हैं लेकिन भाव और सहजता, अंग्रेजी-हिंदी दोनों तरह के संवादों में सध नहीं पातीं. इस कमी के बावजूद उनमें आत्मविश्वास कहीं से कम नहीं लगता और इस वजह से वे फिल्म में देखने लायक बनी रहती हैं. हालांकि यहां पर इसे पहली फिल्म में होने वाली आम गलती कहकर उनके प्रशंसकों को खुश किया जा सकता है और वैसे बाद की फिल्मों में ऐसा शायद ही कभी हुआ हो. इसके अलावा, द हीरो में उनका डॉन्स आपको बहुत बुरा लग सकता है. ‘इन मस्त निगाहों से’ में उन्हें नाचते हुए देखकर लगता है जैसे कोई सेक्सी ठूंठ थिरकने की कोशिश कर रहा है. हो सकता है कि इसमें उनकी कॉस्ट्यूम का दोष हो, लेकिन किसी बॉलीवुड अभिनेत्री के लिए बेहद जरूरी इस योग्यता में वे अपनी इस परफॉर्मेंस से जरा भी खरी नहीं उतरतीं. बाद में वे ‘पिंगा’ जैसी परफार्मेंस तक कैसे पहुंची, यह उनकी मेहनत और लगन का एक और नमूना माना जाना चाहिए.

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